Rahasyamay Kuan 1 Horror Story | New Hindi Horror Stories 2026 | Jary News
रात के करीब 12:30 बज रहे थे। और चारों तरफ मौत का सन्नाटा छाया हुआ था।
और जंगल पूरी तरह से शांत और सुनसान दिख रहा था। ऐसे में काला लबादा पहने एक शख्स हाथ में लालटेन लिए आगे बढ़ रहा था।
और उसके कदम सामने बने एक कुएं की तरफ बढ़ रहे थे। वो कुएं के करीब जाकर रुका और फिर उसने कुएं के अंदर एक पर्ची डाली। उसने जलता हुआ लालटेन कुएं में फेंक दिया। और उसके बाद तेज कदमों के साथ वहां से ऐसे भाग निकला जैसे कि अचानक कोई बड़ा खतरा वहां पहुंच जाओ। अगली शाम इसी गांव में रहने वाली एक औरत कल्याणी अपने आंगन में बैठी हुई थी।
और उसकी बहू आंगन में झाड़ू लगा रही थी।
कल्याणी :- अरे ओ सुस्त मुर्गी कब तक तू उसी कोने में लगी रहेगी? अब आगे बढ़कर यहां की भी झाड़ू लगा दे।
और यह सुनकर घूंघट वाली बहू चारपाई के पास आई और वहां से झाड़ू लगाने लगी और उसकी सास कल्याणी उसे देखकर मुस्कुराने लगी। उसके बाद एक के बाद एक काम वो बहू को बताती जा रही थी
और बहू भी बेचारी काम करती जा रही थी। और कल्याणी इसी तरह से अपनी बहू पर अत्याचार करती थी और बहू बेचारी अपने घर को बसाने के लिए उसकी हर एक बात माना करती। रात के समय कल्याणी अपने कमरे में सो रही थी। तभी उसके चेहरे पर पानी की धारा झपाक से पड़ी।
कल्याणी :- अरे कौन है? इतनी रात में इतना गंदा मजाक कर रहा है।
और फिर कल्याणी ने उठकर देखा तो उसके आसपास कोई नहीं था। उसने देखा कि आंगन में घर के बाहर से पानी बहता आ रहा है। अरे ये पानी कहां से बहता हुआ आ रहा है?
ऐसे तो पूरे बरामदे में कीचड़ हो जाएगी। पानी कहां से आ रहा है? यह देखने के लिए वो घर से निकली और पानी की लहर जिस तरफ से आ रही थी उसके साथ-साथ आगे बढ़ गई। उसने कुछ कदम चलने पर ही देख लिया कि पानी की लहर जंगल की तरफ से आ रही है तो ना जाने क्यों वो डर गई।
कल्याणी :- हे भगवान रे
ना जाने उसे किस बात का डर हुआ। वो भागने के लिए घर की तरफ मुड़ी लेकिन तभी किसी अदृश्य शक्ति ने उसका पैर खींचा। आ कोई मुझे बचाओ। कल्याणी कुएं पर पहुंची और पूरी तरह से गांव के अंदर समा गई।
और उसकी चीख जंगल में गूंजी और चारों तरफ सन्नाटा छा गया।
और यह कहानी मेरी है नमस्कार दोस्तों मेरा नाम रोहन है।
और मैं मेरे परिवार के साथ चांदीपुर गांव में रहता था। हमारा गांव बहुत ही सुंदर था और हमें यहां रहते हुए किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होती थी। मेरे दादा और दादी सरूरपुर गांव में रहते थे।
और वो हर महीने मुझसे मिलने आया करते थे। दादा जी दादी जी। उनको देखते ही मैं उनसे जाकर लिपट गया।
दादी जी :- अरे हमारा रोहन कैसे हो बेटा?
में :- मैं तो अच्छा हूं दादा-दादी। आप दोनों कैसे हो?
दादी जी :- जीता रहे बेटा हम भी ठीक हैं।
और फिर उन्होंने काफी देर तक मुझसे और मम्मी पापा से बात की और मैंने इस बार भी उनसे वही सवाल किया जो मैं हर बार उनसे किया करता था।
और दादा जी मैं आपसे हर बार आपके गांव चलने की बात करता हूं। लेकिन आप मुझे लेकर नहीं जाते हैं। लेकिन आज आपका कोई बहाना नहीं चलेगा। ये सुनकर दादा और दादी दोनों के चेहरे पर गंभीरता के भाव नजर आए। और दादा बोले ठीक है रोहन बेटा। इस बार तो नहीं लेकिन अगली बार जब हम तुमसे मिलने आएंगे तो तुमको अपने गांव लेकर चलेंगे। दादा जी अब फिर से
दादा जी :- अरे रोहन बेटा परेशान मत हो। अगर दादाजी आपको लेने नहीं आए तो मैं और तुम्हारे पापा हम तुमको दादा जी के गांव लेकर चलेंगे।
और फिर अगले महीने दादा मुझे लेने आए। और मैं उनके साथ उनके गांव सरूरपुर आ गया। उनका गांव भी बहुत सुंदर था। पूरे दिन उन्होंने मुझे घुमाया फिराया।
बच्चे यहां पर और शाम के समय दादा जी आपने मुझे गांव तो घुमा दिया लेकिन जंगल तो दिखाया ही नहीं मुझे जंगल भी ले चलिए ना। जंगल का नाम सुनकर दादा-दादी के चेहरे का रंग उड़ सा गया और दादा बोले अबे बेटा जंगल का क्या देखना जंगल तो हर एक गांव का एक जैसा ही होता है। पेड़ पौधे झाड़ियां वो तो ठीक वैसा ही है जैसा तुम्हारे गांव का जंगल है। दादा मुझे जंगल ले जाने से मना क्यों कर रहे थे? यह बात मुझे समझ नहीं आ रही थी। रात होने पर हम सभी आंगन में घाट बिछाए सो रहे थे।
तकरीबन 12:30 बजे मुझे एक आवाज सुनाई दी। रोहन रोहन ये आवाज सुनकर मैं उठा और इधर-उधर नजरें दौड़ाई तो मुझे आसपास कोई नजर नहीं आया।
रोहन इधर आओ। मैं यहां हूं। मैं घाट से उठा और दादा को जगाने ही वाला था कि तभी रोहन अगर तुमने किसी को भी जगाया तो मैं चली जाऊंगी। तुमको जंगल घूमना था ना मैं तुमको जंगल घुमाऊंगी। ये सुनकर मेरे चेहरे पर खुशी झलक आई। रोहन तुम मेरी आवाज का पीछा करते हुए यहां तक आ सकते हो। मैं जंगल की तरफ हूं। मैं उस आवाज का पीछा करता हुआ जंगल की तरफ रवाना हो गया। लेकिन मैं जितना आगे बढ़ता वो आवाज भी दूर होती जा रही थी। आओ रोहन तुम मेरे बहुत करीब हो। मैं जंगल के बेहद करीब था।
तभी किसी ने मेरे कंधे पर पीछे से हाथ रखा। रोहन यहां क्या कर रहे हो? दादा जी वो मैं चलो घर चलो। इतनी रात में यहां घूम रहे हो। तुमको डर नहीं लगता? दादा जी फिर से मुझे घर ले गए। लेकिन मेरे मन में अभी भी वही बात चल रही थी कि जो आवाज मुझे सुनाई दे रही थी।
आखिर वो किसकी थी? अगले दिन शाम होने पर मैंने जाल चली। दादा जी मैं खेलने के लिए गांव के मैदान में जा रहा हूं। अरे बेटा थोड़ी देर रुको मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूं। दादा जी आप मुझे मैदान में तो जाने दीजिए। मैं बहुत बोर हो रहा हूं। मैं बच्चों के साथ खेलना चाहता हूं।
आपको जब आना हो तब आ जाना। मैं मैदान का बहाना करके वहां से निकला। शाम ढलने लगी थी और अब मध्यम अंधेरा शुरू हो गया था। मेरे कदम अपने आप ही जंगल की तरफ बढ़ रहे थे। तभी मेरे सामने एक आदमी आकर रुका। अरे तुम तो मोहन के पोते हो ना? जी काका आप कौन? मैं तुम्हारे दादा का दोस्त हूं। तुम यहां क्या कर रहे हो? काका जी मुझे जंगल में घूमने का मन था।
आप मुझे जंगल घुमा लाइए ना। जंगल में घूमना तुम्हारे लिए ठीक नहीं है। वहां एक कुआं है। कुआं है। लेकिन कुआं तो हमारे गांव में भी है। उससे खतरे की क्या बात है? हमारे गांव का कुआं कोई आम कुआं नहीं है। उसके पास तो मुझ जैसे बूढ़े और गांव के जवान भी जाने की हिम्मत नहीं करते। लेकिन ऐसा क्यों काका? वो सब तुम मत सोचो बेटा। बस इतना समझ लो और जंगल में जाने का विचार छोड़ दो।
ओ ठीक है काका। चलो मैं तुमको घर छोड़ देता हूं। उस रात सबके सोने के बाद मुझे फिर से वो आवाज सुनाई दी। रोहन रोहन जल्दी उठो और मेरे साथ चलो। मैं तुमको आज जंगल दिखा लाती हूं। अरे ये तो वही आवाज है जो कल रात को मुझे सुनाई दी थी। हां, मैं वहीं हूं।
तुमको जंगल घूमना है ना? आओ मैं तुम्हें जंगल घुमा लाती हूं। लेकिन आप हो कौन? ना सामने आती हो ना दिखाई देती हो। मेरे इतना कहने के बाद मुझे जंगल की तरह एक धुआ सा नजर आया। कुछ कदम बढ़ाने के बाद मुझे धुएं के अंदर एक धुंधला आग नजर आ रहा था।
जिससे समझ आ रहा था कि वो कोई औरत है जिसने काली साड़ी पहनी हुई है। रोहन तुमको पहले भी समझाया गया है ना कि जंगल की तरफ जाना ठीक नहीं है। एक बार फिर से दादा जी को सामने देखकर मैं डर गया। दादा जी मैं तो बस बस बस कुछ नहीं चलो। अभी के अभी घर चलो। दादा जी फिर से मुझे घर ले आए। लेकिन मेरे मन में अब जंगल जाने की उत्सुकता और बढ़ गई थी। दादा जी के घर के पास ही एक वैद्य जी रहते थे। सुबह-सुबह एक गुहार से हम सभी की आंखें खुल गई। वैद्य जी वैद्य जी मेरे पति को बचा लीजिए वरना मैं भी मर जाऊंगी। एक औरत अपने पति के साथ वैद जी के घर के बाहर बैठी थी। उसका पति जमीन पर पड़ा था
और उसकी हालत बहुत खराब थी। आ अरे क्या हुआ इसको? इनको खून की उल्टियां हो रही है वैद जी। कल से कई हो चुकी हैं। इसे जल्दी अंदर लेकर जाओ। मेरे दादा और गांव के एक आदमी ने आगे बढ़कर उसके पति को सहारा दिया और उसे वैद जी के घर के अंदर ले गए। मैं भी उनके पीछे घर के अंदर पहुंच गया। ये इसके साथ कब से हो रहा है। वैद्य जी कल सुबह से ही इनके साथ यह हो रहा है।
जब से अब तक ना जाने कितनी उल्टियां कर चुके हैं। घबराओ नहीं। मैं इसकी दवा कर देता हूं। वैद ने काफी समय लगाकर उसके लिए दवा बनाई। ये लो रमेश इसे खा लो। दवा खाने के बाद कुछ देर बाद ही रमेश अपने पैरों पर आ गया और उसकी चीख पुकारें खत्म हो गई।
शुक्रिया बहन जी। इसे मिर्ची वाला कोई भी खाना मत देना। इसको सिर्फ और सिर्फ खिचड़ी खिलानी है और यह पुड़िया दिन में चार बार इसको जरूर देना। जी वैद जी चंद्रावती अपने पति रमेश को लेकर अपने घर चली गई। दोपहर के तकरीबन 4:00 बजे के समय फिर से वो औरत अपने पति को लेकर वैद जी के पास आई। देखिए ना वैद जी इनको फिर से उल्टियां आई है। ये कैसे हो सकता है?
जो दवा मैंने बनाकर दी है वो तो सबसे ज्यादा कारगर है। ऐसा नहीं हो सकता। तुमने इसे दवाई दी थी कि नहीं? रमेश जमीन पर गिर कर तड़पने लगा और उसकी आंखें लालाल चमक उठी। अरे बाप रे ये इसे क्या हो रहा है। अब वैद जी भी उसकी तबीयत देखकर हैरान रह गए थे।
वैद जी कुछ कीजिए ना। माफ करना मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा कि इसे कौन सी मर्ज है। इसे अब कोई नहीं बचा सकता। वैद्य जी की बात सुनकर उसकी पत्नी क्रोधित हो गई। वैद तो कहता है कि मेरे पति को अब कोई नहीं बचा पाएगा। तू देखना मेरे रमेश जिंदा रहेंगे और मैं इनको बचा कर ही रहूंगी। उस रात मैंने पक्का इरादा किया कि आज जंगल जाऊंगा और उस कुएं पर भी होकर आऊंगा।
मैं मौका देखकर रात को 12:00 बजे के समय आखिरकार घर से निकल ही गया। लेकिन बड़े ताज्जुब की बात थी कि आज मुझे कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी। मैं धीमे कदमों के साथ जंगल की तरफ बढ़ रहा था। दिल में डर के साथ-साथ एक एक्साइटमेंट भी थी कि आज मैं उस कुएं को देखने वाला हूं। जिसके बारे में इतने दिनों से कुछ ना कुछ अजीब सुनता हुआ आ रहा हूं। मैं जंगल पहुंचने ही वाला था।
तभी मैंने एक दृश्य देखा। काला लबादा पहने हुए हाथ में लालटेन लिए कोई औरत जंगल की तरफ जा रही है। अरे ये तो वही आवाज है जो कल रात को मुझे सुनाई दी थी।
लेकिन आप हो कौन? ना सामने आती हो ना दिखाई देती हो। आप सामने तो आइए। दादा जी मैं तो बस वो उस कुएं के पास जाकर रुक गई। मैं पहली बार उस कुएं को देख रहा था। उस कुएं के आसपास का वातावरण बहुत ही अलग था। यहां गर्मी के मौसम में भी बहुत ठंड थी। सही में हमारे गांव के कुएं के पास जिस तरह की शांति और सुकून महसूस होता था, इस कुएं के पास अजीब सा सन्नाटा महसूस हो रहा था।
उस औरत ने कुएं की पटरी पर लालटेन रखा और उसके बाद अपने दूसरे हाथ में पकड़ा एक चश्मा जो कि नजर का चश्मा लग रहा था। उस चश्मे को उसने कुएं में फेंक दिया। बाद उसने लालटेन भी कुएं में फेंक दिया और फिर तेज रफ्तार के साथ वहां से भाग निकली। उसको भागता हुआ देखकर अब मुझे भी कुछ समझ में नहीं आया। मेरे भी दिल में अजीब सा डर बैठ गया था और अब मैं भी घर की तरफ भाग रहा था। कुछ ही देर में मैं घर पहुंचा। मेरी सांसे बुरी तरह से फूली हुई थी। कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।
तभी दादाजी हंसने लगे। उनके उठने से पहले ही मैं घाट पर लेट गया और फिर अपनी आंखें बंद कर ली। अगली सुबह हमारे उठने के फौरन बाद ही गांव के मुखिया दादा जी के पास आए। मुखिया जी आप हां महेश बाबू सुना है कि रमेश ने कल से खाना पीना बोलना सब छोड़ दिया था। हो सकता है आज वह अंतिम सांस ग्रहण करें। इसलिए पहले ही उसके घर अफसोस करने जा रहे हैं।
आप भी साथ चलिए। हां हां मुखिया जी मैं भी आ रहा हूं। अब दादा जी और गांव के कुछ लोग मुखिया जी के साथ चल दिए। और मैं भी उनके पीछे हो लिया।
सभी रमेश के घर पहुंचे तो उन्होंने पाया कि रमेश अपनी पत्नी के साथ आंगन में बैठा हुआ है। एकदम सही सलामत नजर आ रहा है। अरे रमेश तुम जी मुखिया जी आइए बैठिए तुम ठीक कैसे हुए ये सब तो भगवान बस चुप रहिए चंद्रावती ने उसकी बात बीच में ही काटते हुए कहा मैंने कहा था ना कि मेरे रमेश को कुछ नहीं होगा नतीजा आप देख सकते हैं यह सुनकर वैद जी हैरान रह गए नहीं यह नहीं हो सकता लगातार इतनी खून की उल्टियां करने के बाद कोई भी इंसान कभी नहीं बच सकता। यह असंभव है।
तो क्या कहना चाहते हैं आप? यहां मेरे पति की आत्मा बैठी है। सरपंच जी गांव के एक आदमी ने उंगली से रमेश के घर की चौखट की तरफ इशारा किया।
तो सबने देखा कि उसकी चौखट पर एक मटकी लटकी हुई है।
ये क्या? उस मटकी को देखकर मुखिया और मेरे दादाजी समेत सभी गांव के लोग हैरान रह गए। जय तुमने बिल्कुल भी ठीक नहीं किया चंद्रावती बिल्कुल भी ठीक नहीं किया मेरे पति के बचने पर मुझे धन्यवाद देने की जगह आप लोग यह कह रहे हैं कि मैंने ठीक नहीं किया चंद्रावती की बात से मैं भी सहमत था। भला उस औरत के पति के जिंदा बचने की खबर से सभी गांव वाले हैरान क्यों थे।
मुखिया ने सबसे ना जाने क्या कहा। उस दिन से शाम होते ही गांव पूरी तरह से खाली हो जाता। सभी ने शाम में घर से निकलना भी बंद कर दिया और गांव के कुछ लोग हाथ में हल्दी की गांठे लिए हुए गांव की गलियों में घूमते और कोई बाहर दिख जाता तो उसे उसके घर छोड़कर आते। दादा जी चंद्रावती के पति के ठीक हो जाते ही गांव का माहौल अजीब क्यों हो गया?
क्यों लोग इस तरह से डर कर घरों में रहने लगे हैं? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा। बेटा रोहन तुम मुझसे वादा करो कि तुम इस बारे में कोई सवाल नहीं करोगे।
तुम कभी भी जंगल में जाने की सोचोगे भी नहीं। जी दादा जी। मैंने दादा जी की हां में हां मिला दी। लेकिन अब मेरे मन में कहीं सवाल उठ रहे थे। कुएं के साथ-साथ अब मुझे यह भी जानना था कि वो औरत कौन थी और इस तरह गांव के लोग चंद्रावती को किस बात का दोषी मान रहे थे।
दादी जी :- रोहन रोहन मेरे पास आओ। मैं आज तुमको जंगल घुमा लाती हूं। रोहन रोहन मेरे पास आओ। मैं आज तुमको जंगल घुमा लाती हूं।
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